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छठ पूजा

Image Generated by Meta AI रहे दुनिया में कहीं भी पर इस दिन संग आते हैं  बिखरे बिखरे मोती छठ के धागे में बंध जाते हैं...  ये चार दिन साथ पूरा परिवार होता है,  कुछ ऐसा पावन छठ का त्योहार होता है...  भोरे भोर नहाकर सब कद्दू भात खाते हैं,  सात्विक भोजन का अर्थ सारी दुनिया को समझाते हैं,  साफ़ हमारा अच्छी तरह घर द्वार होता है,  कुछ ऐसा पावन छठ का त्योहार होता है...  लकड़ी के चूल्हे पर खरना का प्रसाद बनाते हैं  बच्चे बूढे रोटी खीर, केले के पत्ते पर खाते हैं  दिनभर की भूखी व्रती का ये एकमात्र फलाहार होता है  कुछ ऐसा पावन छठ का त्योहार होता है...  अगले दिन, बाँस की टोकरी में सारे फल सजाते हैं  विश्व-प्रसिद्ध, सबसे स्वादिष्ट, ठेकुआ हम पकाते हैं...  पाँव में अलता और सिंदूर का श्रृंगार होता है  कुछ ऐसा पावन छठ का त्योहार होता है...  मैथल - मगही में सभी लोकगीत गाते हैं  अमीर - गरीब नंगे पाँव चलके घाट आते हैं सर पर रखा दउरा जिम्मेदारी का भार होता है कुछ ऐसा पावन छठ का त्योहार होता है... फल फूल, धूप कपूर, घाट पर शोभ...

Chandravansh Aur Suryavansh

हमारे पुराणों में हमने कई राजाओं की कहानियाँ सुनी है। उनमें से ज्यादातर राजा या तो सूर्यवंश के होते हैं या तो चंद्रवंश के। लेकिन चंद्रवंश और सूर्यवंश की शुरुआत बहुत कम लोगों को ज्ञात है।  ब्राह्मण की रचना भगवान ब्रह्मा ने की थी। यही कारण है कि उन्हें परम पिता भी कहा जाता है। ब्रह्मा ने ही दक्ष प्रजापति की रचना की थी और ब्रह्मा को ही कश्यप मुनि और सूर्य का पिता माना जाता है। पृथ्वी का पहला पुरुष "मनु" को भी ब्रह्मा का वंशज माना जाता है। इसी तरह सूर्यवंश की शुरुआत हुई जिसमें कई महान राजाओं ने राज किया। उदाहरण दिलीप ने धर्म स्थापना में मुख्य किरदार निभाया था। उन्होंने गो रक्षा की थी। राजा हरिश्चंद्र भी सूर्यवंशी थे। उन्होंने अपनी सच्चाई से और वादा निभाने की क्षमता से सूर्यवंश का नाम बहुत ऊँचा कर दिया। सूर्यवंश के एक और राजा थे रघु। उन्होंने अपने राज में काफी दान - पुण्य किया था। उनके नाम पर ही उनके वंश का नाम रघुकुल पड़ा। इसी वंश में एक राजा थे जिनका नाम था "अज"। वे अपनी पत्नी से इतना प्रेम करते थे कि अपनी पत्नी के देहांत के बाद उन्होंने खुद भी जल समाधि ले ली...

छठ महापर्व

Art By : Amrita Patnaik  छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष के चतुर्थी में होती है। चार दिन बाद कार्तिक शुक्ल सप्तमी को समाप्त होती है। सबसे पहले घर की पूरी साफ सफाई होती है। घर को पूरी तरह सजाया जाता है। और मांसाहारी खानपान इस दौरान पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। सप्तमी को “नहाए खाए” पर्व पालित किया जाता है। इस दिन छठ व्रती नहा धोकर, पूरी साफ सफाई का खयाल रखते हुए खाना बनाती है और पूजा के बाद ही खाना खाया जाता है। इस दिन खाने में चावल दाल और लौकी की सब्जी बनाई जाती है। दाल भी विशेषकर चना दाल जिसमें लौकी डालकर पकाया जाता है। इसी दिन से व्रत शुरू हो जाता है क्यूँकि छठ व्रती को इसी दिन से लहसून, टमाटर, मसाले इत्यादि खाने की मनाही होती है। दूसरे दिन “खरना” का पर्व मनाया जाता है। इस दिन छठ व्रती पूरे दिन का व्रत रखती है। अन्न - जल का त्याग कर पूरे दिन वे उपवास रखती हैं। सुबह से ही छठ व्रती प्रसाद पकाती हैं। प्रसाद पकाने हेतु “गैस चूल्हा” का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि लकड़ी चूल्हा का इस्तेमाल होता है। प्रसाद के रूप में खीर और रोटी पकाई जाती है। प्रसाद के रूप में खीर और रोटी ...

छठ पूजा क्यूँ मनाया जाता है?

Art By : Amrita Patnaik  इतिहासकार मानते हैं कि इंसान उन्हीं चीज़ों की पूजा करता है जिससे उसे कोई लाभ हो या जिससे उसे भय हो। उदाहरण के तौर पर सूर्य, वृक्ष, भूमि, पर्वत, गाय, तुलसी, आदि से इंसान को अनेक फ़ायदे होते हैं। इसी कारण मानव इन सभी की पूजा करता है। वहीं दूसरी ओर सर्प, ज्वालामुखी, यमराज, आदि से मानव भयभीत रहता है। इसीलिए वो इनकी पूजा करता है। हिंदू धर्म के अनुसार ये माना जाता है कि आकाश में अट्ठाइस (28) नक्षत्र और बारह (12) राशियाँ होती हैं। पृथ्वी का मौसम इन्हीं राशियों के इर्द गिर्द घूमता है। जब सूर्य मकर राशि (capricorn) में पहुँचता है तब ग्रीष्म ऋतु की शुरूआत होती है। साल के इस वक़्त देवता गण शक्तिशाली होते हैं और दानव कमजोर होते हैं। दिन बड़े होते हैं और रातें छोटी। कुछ महीनों बाद जब सूर्य काल चक्र में घूमते हुए कर्क राशि (cancer) में पहुँचता है तब शीत ऋतु की शुरुआत होती है। ग्रीष्म ऋतु के विपरीत साल के इस समय दानव शक्तिशाली होते हैं और देव कमजोर। दिन छोटे होते हैं और रातें बड़ी। वातावरण में आसुरी शक्ति बढ़ने लगती है। इन्हीं शक्तियों को, इन्हीं अंधेरों को दूर कर...

वामांगिनी

Art By : Ananya Behera  “मर्द” - ये शब्द बोलने में, लिखने में या सुनने में जितना भारी भरकम प्रतीत हो रहा है, वास्तव में ये इसके बिल्कुल विपरीत है। ईश्वर ने एक बार सबसे कमजोर दिल बनाया, सबसे ज्यादा भावुक था वो दिल जिसमे अगाध प्रेम था। किंतु ये नाज़ुक सा दिल कहीं टूट ना जाए इसी कारण ईश्वर ने उसे एक शक्तिशाली काया में कैद कर दिया। कमजोर दिल और मजबूत काया की इसी विषम मेल का नाम है - “मर्द”। उसी दिल की रक्षा करने हेतु पुरुष बाहरी अवारण का सहारा लेता है ताकि उनकी ये कमज़ोरी बाकी दुनिया से छिपी रह सके। अपनी इसी कमज़ोरी को दुनिया से छिपाते, ये जानते हुए कि वो खुद कितना कमजोर है - ये चीज़ें उसमें आक्रोश भर देती है। मनुष्य ये जानता है कि “क्रोध” पर नियंत्रण कितना आवश्यक है। क्रोध हमेशा इंसान को विपत्ति की और ढकेल देता है। ये जानते हुए भी मर्द, अपने क्रोध को काबू में नहीं रख पाता और जीवन में प्रति-पल मुसीबत की ओर अग्रसर रहता है। अगर पृथ्वी पर केवल मर्द ही होते तो शायद फिर ये पृथ्वी ही न होती। मर्द - जो जेहनी तौर पर कमजोर होते हैं, वास्तव में बहुत कमजोर, उन्हें चाहिए होती है शक्त...

प्यारी बातें

जब वक़्त हो और कोई पूछ ले कैसे हो, वो है प्यारी बातें, जब बेवक़्त हो और कोई कह दे कुछ नहीं होगा वो है प्यारी बातें । जब तुम खुश हो और कोई हँसके खुश हो जाये, वो है प्यारी बातें। जब तुम किस्मत को कोसो और कोई तुम्हारे हाथों को पकड़ कर थाम ले एक लम्हे के लिए ,वो है प्यारी बातें। जब तुम हो सहारा किसी का, और कोई आगे बढ़े ज़िन्दगी में, वो है प्यारी बातें। और जब तुम्हारे साथ कोई न हो, और कोई पलके झपका के तुम्हारी हँसी ले आये, वो है प्यारी बातें। जब तुम आँखें मूँद लो गम में, और कोई आँखों ही आँखों में याद हो, वो है प्यारी बातें। जब तुम टूट रहे हो,और किसी को याद कर रहे हो, और वो सामने आ जाये, वो है प्यारी बातें। और जब तुम याद करो उन सारी बातों को, जो तुम्हें खुश करे और उन्हें हमारी याद आ जाये,, वो है प्यारी बातें। -शिवा 17sept / 2016

कभी पढ़ के देख तू

कभी पढ़ के देख तू कभी पढ़ के देख तू, कभी थम के देख तू, कभी थाम के देख तू, कभी मेरे यार,, ज़िन्दगी जी के देख तू!! कभी पढ़ के देख तू, इन आसमानों की चाहत को , सिर्फ बादल लिए बैठे हैं,, सुनो, आवाज़ दे रही है, तुम्हें बुलाने को, के अभी क्षितिज बचा है छूने को। कभी पढ़ के देख तू, तेरी मईया की आँखों को, छू के देख अपने पापा की हथेली को, कितने खाब छुपाये बैठे हैं, कुछ बनना है ज़िन्दगी में, तो बन के देख आज, अपने माँ-बाप का बेटा। कभी पढ़ के देख तू,, खुद में बनी उस चाहत को, जिसे बनानी है अमानत उस इरादे को, कभी पढ़ के देख, अपने पुरानी यादों को, उस तकलीफ को, जो न सिर्फ तुझे मिली थी, बल्कि तेरी वजह से किसी को मिली थी। कभी पढ़ के देख, उन लोगों की सोच को जो अपनी नासमझी की बातों से डंक मारते हैं, चुभोते हैं अपने इरादों को, तुम्हारे दिल के अंदर,, पैदा करते हैं,, द्वेष, पढ़ के देख, फिर समझ के देख, कितनी सुन्दर है दुनिया,, यहाँ एक चलते खिलौने को भी इंसान गिरा देते हैं,, और उफ़ हम तो इन्सान है। कभी पढ़ के देख अपनी मोहब्बत के विश्वास को, उसकी प्यारी बातों को, उसकी एक तेरे साथ रहने की आश को। और कभी वक़्त...

एक प्रश्न चिन्ह

एक प्रश्न चिन्ह Art By : Amrita Patnaik आओ मित्रों तुमको सुनाऊँ एक बात अनोखी। ये बात है बिलकुल सच्ची ये बात है आँखों देखी। संतों के इस देश में, पूजते हैं लोग सरस्वती को। लेकिन शर्म की बात है पढ़ाते नहीं स्वयं की बेटी को। पूजते हैं लोग अंबे को, काली को कहते हैं इन्हें आदि शक्ति। फिर भी लोगों को पता नहीं आखिर क्या है नारी शक्ति। पूजते हैं लोग मंदिर में बैठी लक्ष्मी को जलाते हैं दीपक की बाती । लेकिन गृहणी रूपी लक्ष्मी को मानते हैं पैरों की जूती। बेटी, बहन, माँ - प्रेम की दायी, नारी के रूप विभिन्न हैं । दुख की बात है, इसके सम्मान पर आज भी एक प्रश्न चिन्ह है । ? -दीपक कुमार साहु Deepak Kumar Sahu 4/10/2012 Word Meanings Art By : Ananya Behera  1.स्वयं -  Own 2.आदि शक्ति - First / Source Energy 3.गृहणी - Wife 4.दायी - Giver 5.विभिन्न - Different froms

पत्थर की मूरत

Art By : Ananya Behera  कुछ दिनों बाद मेरे परीक्षा का परिणाम आना था। और मुझे मंदिर में, अच्छे नंबर के लिए भीख माँगने जाना था। पूजा के लिए फूल चुराए पड़ोसी के आँगन से। प्रसाद खरीदा मैंने पूरे रुपए इक्यावन के। किस विषय में कितने नंबर माँगू, इस विचार में, मैं इतना घुल गया। कि जल्दी - जल्दी में घुसने से पहले, जूते उतारना भूल गया। क्रोधित पंडित ने कहा : “ये सीढ़ियाँ वापस उतर जाओ और उस पत्थर पर जूते उतारकर आओ” मैंने देखा कि हर कोई, बाहर पड़े पत्थर पर जूते उतार रहा है। तो अंदर पड़े पत्थर की आरती उतार रहा है। मैंने मन में तभी अचानक एक प्रश्न आया यूँ। कि दो समान रंग और किस्म के पत्थरों में, इतना भेदभाव क्यूँ? फिर कही से आवाज आई : "जिस कारण की तुझे इतनी आस है, उस सवाल का जवाब केवल मेरे पास है” मैंने अपनी नज़र दौड़ाई चारों ओर। तो पता चला कि उस पत्थर ने मचाया था शोर। पत्थर ने कहा :- अगर जानना है तुझे जवाब अपने सवाल का। तो तुझे सुनना होगा किस्सा मेरे जीवनकाल का। बहुत साल पहले एक राजा ने यह मं...

ईश्वर की खोज

ईश्वर की खोज Drawn By :- Shashank Shekhar Barik साल भर बाद जब मेरा जन्मदिन आया। तब माँ ने सुबह - सुबह ईश्वर का प्रसाद खिलाया। माँ : तूने केवल जीया है नए दौर का नया ज़माना। इसलिए शायद तूने कभी ईश्वर को नहीं माना। पर इस जन्मदिन मैं चाहती हूँ, तू शीश झुकाकर जाए। जग के पालनकर्ता के आशीष उठाकर लाए। मैंने बोला : माँ की बातें नहीं टालना लोग जहां के कहते हैं। पर ये तो बता दे माँ, ये ईश्वर कहाँ पर रहते हैं। माँ :- इसी सवाल का जवाब ढूँढ रहे हैं लोग, हर क्षण, हर रोज़। ईश्वर का पता ठिकाना खुद जाकर खोज। ईश्वर के अस्तित्व पर भी जिसको नहीं था विश्वास। मुझ जैसा इंसान चला करने प्रभु की तलाश। जब मैंने लोगों से पूछा कहाँ है ईश्वर का निवास। देकर मंदिर का पता उन्होंने जताया आँखों से विश्वास। अंदर जाकर मैंने देखा लोग थे हक़ीक़त से अंजान। बता रहे थे पूछने पर पाषाण को प्रभु की पहचान। मैंने जाकर पंडित को कहा कि ये तो है केवल पत्थर की मूरत। ये सुन क्रोधित होकर बोला पंडित “तेरी इतनी जुर्रत” सुन कर मेरी अजीब सी बोली...