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Kya Karun?

क्या करूँ?  Image Credit : Meta AI कोई दिल को इतना भा जाए तो क्या करूँ?  वो आँखों में देख के मुस्कुराए तो क्या करूँ?  उससे प्यार नहीं करने का, वादा तो कर लिया,  वो बिंदी लगा के आ जाए तो क्या करूँ?  शर्माने का काम तो उसका होना चाहिए,  वो हद से ज्यादा पास आ जाए तो क्या करूँ?  बंद कमरे में रहने की आदत सी हो गयी थी  वो सरे बाजार मुझे घुमाए तो क्या करूँ?  दुनिया से छिपा के रखना तो चाहता था उसे  मेरे बाहों में वो अपना हाथ सजाए तो क्या करूँ? उसे छुने से परहेज तो कर रखा था मैंने,  वो हाथों से खाना खिलाए तो क्या करूँ?  उससे बातें - वातें, बंद कर दूँगा सोचा था,  वो सामने मेरे रख दे चाय तो क्या करूँ?  कर देंगे नजर-अंदाज उसकी बातों को  वो आँखों से आँखें मिलाए तो क्या करूँ?  ये उजड़ा दिल आबाद ना होगा, मान लिया था,  कोई बस जाए बिना किराए तो क्या करूँ?  रूठ जाने का इरादा तो कर लिया था मैंने  वो काजल लगा के आ जाए तो क्या करूँ? बहुत कोशिश की थी यार!! कि उससे प्यार ना करूँ,  वो साड़ी पहन के झुमके लहराए तो ...

टूटता तारा

Image Generated from Meta AI   अगर प्यार में ये दिल मेरा, हारा ना होता,  ये शायरी ना होती, ये मुशायरा ना होता...  मैं सामने बैठे, ब्लैक-बोर्ड ही देखता रह जाता,  काँधे पे हाथ रख, तुमने अगर पुकारा ना होता...  देख कर तुम्हें मेरी धड़कन यूँ ना बढ़ती  उम्र का वो बरस अगर अठारह ना होता...  दिवाली की उसी रात को ही मर जाता मैं अगर,  एक कान में पहना झुमका तुमने उतारा ना होता... हम किसी और को भी ये दिल दे देते अगर  साड़ी पहनकर तुमने खुदको संवारा ना होता...  बात मेरे प्यार की दुनिया में ना आती अगर  दोस्तों के पूछने पर मैंने स्वीकारा ना होता...  प्यार मेरा बढ़ता गया, नंबर मेरे कमते गए,  अब रातों को बिन बात किए मेरा गुजारा ना होता...  सपनों में रोज़ तुम मिलने चली आती थी,  काश तेरे तस्वीर को मैंने इतना निहारा ना होता...  अपने दिल के प्यार को, दिल में ही रखता अगर,  तो दोस्ती और प्यार का यूं बंटवारा ना होता...  इमरोज के प्यार को मिल जाती एहमियत अगर  तो दुनिया की नजर में, मैं भी बेचारा ना होता...  तुम होती...

Kuch bhi nahi

शब्दार्थ   महताब - चाँद, रुखसार - गाल, चारा-साज़ - डॉक्टर, जॉन - Jaun Elia कुछ भी नहीं  ईद का महताब उसके रुखसार के अलावा कुछ भी नहीं  और मेरे प्यार में, इंतज़ार के अलावा कुछ भी नहीं... उसे देखा तो जाना कि, परियों की दुनियाँ सच्ची है,, मैं तो मानता था, ब्राह्मण में इस संसार के अलावा कुछ भी नहीं... वो एक बार देख लेती है और मैं मर जाता हूँ,, आँखें उसकी सच बोलूँ, एक हथियार के अलावा कुछ भी नहीं... सुबह होती है और मैं सपने भूल जाता हूँ,, याद बस उसकी पायल की झनकार के अलावा कुछ भी नहीं... मेरे दिल के घर को बस तुमने ही हथियाया है,,  और मैं तेरे दिल के किराए-दार के अलावा कुछ भी नहीं... तू कहानी है मेरी... तू मेरी जिंदगी है...  मैं तेरी जिंदगी में एक किरदार के अलावा कुछ भी नहीं...  उसे जो पसंद है वो तोहफे महंगे आते हैं,, और मेरे जेब में रुपये चार के अलावा कुछ भी नहीं... मुझे खुद से मेहनत करना है और जग में आगे बढ़ना है,, विरासत में मिला मुझे संस्कार के अलावा कुछ भी नहीं... मैंने भी कमाएं हैं जिंदगी में कुछ ऐसे रिश्ते,, कि दौलत के नाम पर दो यार के अलावा कुछ भी नहीं... स...

Jee kar koi mar jata hai...

जी कर कोई मर जाता है... प्यार का रंग महबूब पे कुछ ऐसा कर जाता है,  हर बार उसमें हमको नया गुलिस्तां नजर आता है...  होने को तैय्यार वो वक्त नहीं लगाती,  हँसती है वो और चेहरा संवर जाता है...  कहते हैं लोग कि जिंदगी तेज चलती है,  वो आती है सामने और आलम ठहर जाता है...  कान पकड़ते हैं लोग उस्तादों का नाम लेके  तेरा नाम लेता हूँ और हाथ दिल पर जाता है...   कृष्ण के मुख में होगा ये ब्रह्मांड मगर,  आँखों में तेरी मुझे दुनियाँ नज़र आता है...  रातों को जगना इतना भी मुश्किल नहीं,  मैं तकता हूँ तेरी तस्वीर, और सहर हो जाता है...  दोस्तों को मालूम है मुझको कैसे छेड़ा जाए,  वो लेते हैं नाम तेरा, मेरा चेहरा निखर जाता है...  मैं भी अपने चाँद को तारे देना चाहता हूँ,  पर टूटता है तारा तो टूटकर किधर जाता है?  वो तो मुझको कहती है कि "बड़े बदमाश हो गए हो"  पर मैंने सुना था मोहब्बत कर लो, बंदा सुधर जाता है...  बाजार में उसके पीछे, कभी इस दुकां कभी उस दुकां जैसे माँ का पल्लू पकड़े बच्चा,  कभी इधर जाता है, कभी उधर ...

रुख़सत

अब से पहले आँसू शराब में घुलाया ही नहीं था इससे पहले किसी ने मेरा मुँह खुलाया ही नहीं था  इस तरह जन्मदिन पर फोन किया तुमने  जैसे कभी तुमने मुझे भुलाया ही नहीं था  मिलकर भी दोस्त तुम्हारे पराई नजरों से देखते हैं ठीक तरह से तुमने मिलाया जुलाया ही नहीं था  मैंने पुकारा तुमको तो तुमने मुह फ़ेर लिया इस तरह तो किसीने रुलाया ही नहीं था  कुछ इस तरह महफिल से हमने रुख़सत कर दी जैसे इस जलसे में कभी बुलाया ही नहीं था ढक कर चादर फिर सर पर हाथ फ़ेरा माँ ने इस तरह तो किसीने सुलाया ही नहीं था…  -दीपक कुमार साहू  25/05/2022 07:00 PM