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Chandravansh Aur Suryavansh

हमारे पुराणों में हमने कई राजाओं की कहानियाँ सुनी है। उनमें से ज्यादातर राजा या तो सूर्यवंश के होते हैं या तो चंद्रवंश के। लेकिन चंद्रवंश और सूर्यवंश की शुरुआत बहुत कम लोगों को ज्ञात है।  ब्राह्मण की रचना भगवान ब्रह्मा ने की थी। यही कारण है कि उन्हें परम पिता भी कहा जाता है। ब्रह्मा ने ही दक्ष प्रजापति की रचना की थी और ब्रह्मा को ही कश्यप मुनि और सूर्य का पिता माना जाता है। पृथ्वी का पहला पुरुष "मनु" को भी ब्रह्मा का वंशज माना जाता है। इसी तरह सूर्यवंश की शुरुआत हुई जिसमें कई महान राजाओं ने राज किया। उदाहरण दिलीप ने धर्म स्थापना में मुख्य किरदार निभाया था। उन्होंने गो रक्षा की थी। राजा हरिश्चंद्र भी सूर्यवंशी थे। उन्होंने अपनी सच्चाई से और वादा निभाने की क्षमता से सूर्यवंश का नाम बहुत ऊँचा कर दिया। सूर्यवंश के एक और राजा थे रघु। उन्होंने अपने राज में काफी दान - पुण्य किया था। उनके नाम पर ही उनके वंश का नाम रघुकुल पड़ा। इसी वंश में एक राजा थे जिनका नाम था "अज"। वे अपनी पत्नी से इतना प्रेम करते थे कि अपनी पत्नी के देहांत के बाद उन्होंने खुद भी जल समाधि ले ली...

छठ महापर्व

Art By : Amrita Patnaik  छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष के चतुर्थी में होती है। चार दिन बाद कार्तिक शुक्ल सप्तमी को समाप्त होती है। सबसे पहले घर की पूरी साफ सफाई होती है। घर को पूरी तरह सजाया जाता है। और मांसाहारी खानपान इस दौरान पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। सप्तमी को “नहाए खाए” पर्व पालित किया जाता है। इस दिन छठ व्रती नहा धोकर, पूरी साफ सफाई का खयाल रखते हुए खाना बनाती है और पूजा के बाद ही खाना खाया जाता है। इस दिन खाने में चावल दाल और लौकी की सब्जी बनाई जाती है। दाल भी विशेषकर चना दाल जिसमें लौकी डालकर पकाया जाता है। इसी दिन से व्रत शुरू हो जाता है क्यूँकि छठ व्रती को इसी दिन से लहसून, टमाटर, मसाले इत्यादि खाने की मनाही होती है। दूसरे दिन “खरना” का पर्व मनाया जाता है। इस दिन छठ व्रती पूरे दिन का व्रत रखती है। अन्न - जल का त्याग कर पूरे दिन वे उपवास रखती हैं। सुबह से ही छठ व्रती प्रसाद पकाती हैं। प्रसाद पकाने हेतु “गैस चूल्हा” का उपयोग नहीं किया जाता बल्कि लकड़ी चूल्हा का इस्तेमाल होता है। प्रसाद के रूप में खीर और रोटी पकाई जाती है। प्रसाद के रूप में खीर और रोटी ...

छठ पूजा क्यूँ मनाया जाता है?

Art By : Amrita Patnaik  इतिहासकार मानते हैं कि इंसान उन्हीं चीज़ों की पूजा करता है जिससे उसे कोई लाभ हो या जिससे उसे भय हो। उदाहरण के तौर पर सूर्य, वृक्ष, भूमि, पर्वत, गाय, तुलसी, आदि से इंसान को अनेक फ़ायदे होते हैं। इसी कारण मानव इन सभी की पूजा करता है। वहीं दूसरी ओर सर्प, ज्वालामुखी, यमराज, आदि से मानव भयभीत रहता है। इसीलिए वो इनकी पूजा करता है। हिंदू धर्म के अनुसार ये माना जाता है कि आकाश में अट्ठाइस (28) नक्षत्र और बारह (12) राशियाँ होती हैं। पृथ्वी का मौसम इन्हीं राशियों के इर्द गिर्द घूमता है। जब सूर्य मकर राशि (capricorn) में पहुँचता है तब ग्रीष्म ऋतु की शुरूआत होती है। साल के इस वक़्त देवता गण शक्तिशाली होते हैं और दानव कमजोर होते हैं। दिन बड़े होते हैं और रातें छोटी। कुछ महीनों बाद जब सूर्य काल चक्र में घूमते हुए कर्क राशि (cancer) में पहुँचता है तब शीत ऋतु की शुरुआत होती है। ग्रीष्म ऋतु के विपरीत साल के इस समय दानव शक्तिशाली होते हैं और देव कमजोर। दिन छोटे होते हैं और रातें बड़ी। वातावरण में आसुरी शक्ति बढ़ने लगती है। इन्हीं शक्तियों को, इन्हीं अंधेरों को दूर कर...

वामांगिनी

Art By : Ananya Behera  “मर्द” - ये शब्द बोलने में, लिखने में या सुनने में जितना भारी भरकम प्रतीत हो रहा है, वास्तव में ये इसके बिल्कुल विपरीत है। ईश्वर ने एक बार सबसे कमजोर दिल बनाया, सबसे ज्यादा भावुक था वो दिल जिसमे अगाध प्रेम था। किंतु ये नाज़ुक सा दिल कहीं टूट ना जाए इसी कारण ईश्वर ने उसे एक शक्तिशाली काया में कैद कर दिया। कमजोर दिल और मजबूत काया की इसी विषम मेल का नाम है - “मर्द”। उसी दिल की रक्षा करने हेतु पुरुष बाहरी अवारण का सहारा लेता है ताकि उनकी ये कमज़ोरी बाकी दुनिया से छिपी रह सके। अपनी इसी कमज़ोरी को दुनिया से छिपाते, ये जानते हुए कि वो खुद कितना कमजोर है - ये चीज़ें उसमें आक्रोश भर देती है। मनुष्य ये जानता है कि “क्रोध” पर नियंत्रण कितना आवश्यक है। क्रोध हमेशा इंसान को विपत्ति की और ढकेल देता है। ये जानते हुए भी मर्द, अपने क्रोध को काबू में नहीं रख पाता और जीवन में प्रति-पल मुसीबत की ओर अग्रसर रहता है। अगर पृथ्वी पर केवल मर्द ही होते तो शायद फिर ये पृथ्वी ही न होती। मर्द - जो जेहनी तौर पर कमजोर होते हैं, वास्तव में बहुत कमजोर, उन्हें चाहिए होती है शक्त...

स्याही लाए सवेरा

स्याही लाए सवेरा Art By : Amrita Pattnaik किसी महान इंसान ने सच ही कहा है कि “ कलम की धार, तलवार की धार से भी तेज़ होती है” और इतिहास में घटित कई घटनाएँ इसकी साक्षी रही हैं। इसे आप कथाकारों की लेखन शक्ति ही कह सकते हैं कि जब कोई लेखक कथा, काव्य, निबंध, गद्य में अपनी बात रखता है तो पाठक और श्रोता उन पात्रों को, उन किरदारों को स्वयं अपने समक्ष देख पाते हैं। ऐसा माना जाता है कि “लिखना छलकने का दूसरा नाम है”। एक लेखक तब तक नहीं लिख सकता जब तक वो भावनाओं की असीम ताकत से पूरी तरह से भर नहीं जाता और फिर जो छलकता है, उस कलाम में इतनी शक्ति होती है कि किसी भी अंधेरे में नए सवेरे की रोशनी ला सकती है। लेखन में वो शक्ति होती है जो हमारे दुख में दबे भावों को बेड़ियों से मुक्त कर देती है। रचनाएँ, कविताएँ, गीत, ये वो कहन हैं जो हम कहना तो चाहते हैं पर कह नहीं पाते। लेखक उन्हीं भावों को शब्द रूपी नवरंग फूलों में संजोकर रचनाओं की माला में पिरो देते हैं। इसलिए उस हार को देखते ही हमारे अंदर अपनत्व की भावना उमड़ पड़ती है। एक शायर ने ठीक ही कहा था कि “शायर वो होते हैं जो आपके होठों के शब्दों क...