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आकांक्षा

रोज नई चुनौती, उथल-पुथल, जीवन में कोलाहल चाहता हूँ  फिर भी स्वभाव, अपना मैं, निर्मल और शीतल चाहता हूँ...  गिनती में भले अधिक हो, द्वारका की नारायणी सेना,  निहत्थे कृष्ण जहाँ उपदेश दें, मैं तो वही दल चाहता हूँ  सही और गलत की, सही परख कर सकूँ, अपने अंदर ईश्वर से, बस इतनी सी अकल चाहता हूँ... कब तक ये खामोशी, चुभती रहेगी हमारे बीच  तेरे मेरे झगड़े का मैं, अंतिम कोई हल चाहता हूँ...  किसी का दमन करने का, मुझको कोई शौक नहीं पर,  आत्मरक्षा कर सकूँ, इतना तो बल चाहता हूँ...  इंसान और इंसानियत पे, फिर से भरोसा करने लगा हूँ  टूट जाऊँ फिर से, ऐसा कोई छल चाहता हूँ... पढ़कर मेरे लेखन को तुम, हँस भी दो और रो भी दो, जिंदगी में बस इक दिन, ऐसा ही एक पल चाहता हूँ... जिन लोगों ने बीते कल में, मुश्किल में भी साथ दिया  सिर्फ उन्हीं के साथ मैं अपना, आने वाला कल चाहता हूँ ...  -दीपक कुमार साहू  6th December 2022 11 : 51 PM

बाकी है...

अभी बस दिन भर काम किया है,  अभी तो पूरी शाम बाकी है...  अभी तो चंद लोग जानते हैं मुझे, दुनिया में करना नाम बाकी है...  मैं हार जाऊँ ऐसा हो नहीं सकता,  जब तक ना जीत लूँ, कहूँगा अंजाम बाकी है...  दो मुलाकात में मुझे राम ना समझ लेना,  अंदर मेरे नटखट घनश्याम बाकी है...  दोस्त शराब पीकर चले गए, मैं बैठा रह गया,  वो आई नहीं उसके आँखों का जाम बाकी है... वो कातिल है, देख ले एक नजर तो मर जाता हूँ,  और दिल भी चुराया है, चोरी का इल्ज़ाम बाकी है  रास्ते पर तुमने नजरअन्दाज कर दिया,  अगली बार मिलना, दुआ सलाम बाकी है… याद है एक बात शुरू की थी तुमने,  उस पर पूर्ण विराम बाकी है...  "अच्छा सुनो..." कहकर तुम चुप हो गई थी,  तुम कहकर जो ना कह पाई वो पयाम बाकी है...  चंद पैसों के लिए खुद को नीलाम किया है,  वक़्त आने दो, मेरा सही दाम बाकी है...  अभी तो बस कुछ शायरी लिखी है,  लिखना पूरा कलाम बाकी है...  तुम दर्द देके अरे कहाँ चल दिये,, याद रखना मेरा इंतकाम बाकी है… -दीपक कुमार साहू  23rd March 2022