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कहानी अभी खत्म नहीं हुई है - अध्याय 2



अध्याय 2
हम सभी बड़े थक गए थे। मैंने सोचा, कोई ना कोई लेने जरूर आएगा हमें रेल्वे स्टेशन। मैं गलत था। कोई भी नहीं पहुँचा। हम थके मांदे स्टेशन से बाहर निकले। स्टेशन की गेट पर हमने सामान रखा। तब पापा कोई रिक्शा लेने गए थे यहाँ मैं पानी की प्यास से बेहाल हो रहा था। हमारे बोतल का पानी खत्म हो गया था। मैंने भी सोचा अब बुआ के जाकर ही पी लेंगे। इतने में पापा आए रिक्शा नहीं बल्कि मिठाई लेकर। कहने लगे बहन के घर खाली हाथ कैसे जाएँगे। फिर वो रिक्शा लेने गए।


रिक्शा और वो भी बिहार का मेरे लिए खासा परेशानी का सबक बन चुका था। एक छोटी सी घटना मुझे याद है, पिछली बार जब मैं यहाँ आया था, तब पिताजी ने दो रिक्शा किया था, हम चार लोगों के लिए। बेगूसराय और सम्बलपुर, इन दो शहरों के रिक्शा में बहुत फर्क़ है। रिक्शा का तल जिसपर हम पैर रखते हैं, सीट पर बैठने पर, वह सम्बलपुर के रिक्शे में तो समतल होती है पर बेगूसराय के रिक्शे में वह तल 45° के कोण में नीचे की ओर झुकी हुई होती है। उस वर्ष मैं और माँ एक रिक्शे पर थे। मुझे ऐसे रिक्शे का अनुभव नहीं था। मैं जैसे ही पैर रखता पैर फिसलने लगता था। मैं बगल वाली लोहे की मोटी छड़ पकड़ कर बैठ गया। रिक्शेवाला रिक्शा बड़ी तेजी से चलाने लगा। और घंटियाँ इतनी तेज बाजाने लगा मानो चिल्लाकर यह कह रहा हो - बगल हो जाइए, यह सड़क हमारी है।

थोड़ी दूर जाकर आगे, हमारी रिक्शा एक दुर्घटना से बाल - बाल बची। तब रिक्शेवाले ने बताया कि रिक्शा में ब्रेक नहीं है। इतना सुनते ही मैं डरने लगा परंतु रिक्शावाला उसी वेग से चलता रहा। आगे थोड़ी ही दूर बढ़ा था कि रिक्शेवाले ने एक और रिक्शे को ठोक दिया। अब इन दो रिक्शेवालों में झगड़ा हो गया। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे। झगड़ा शांत होने पर हम आगे बढ़े। मेरे पापा ने कहा कि पहले बताते तो हम तुम्हारी रिक्शे में नहीं चढ़ते। तब उस रिक्शेवाले ने आंचलिक बोली में कहा - "आए एगो बिरेक लगाइए लेबे"। इसका मतलब है - आज एक ब्रेक लगा ही लूँगा। आपको एक बात बताना तो भूल ही गया। जब रिक्शा ने टक्कर मारी थी तब पैर फिसल गया था। मैं लोहे की मोटी छड़ पकड़ा हुआ था पर टक्कर लगते ही मैं गोल घुम गया और रिक्शे के बाहर पहुँच गया था। शुक्र है पीछे कोई व वाहन नहीं आ रहा था। वर्ना दुर्घटना मेरे साथ भी घट सकती थी।

उस समय वर्तमान में मैं यही सोचकर डर रहा था कि पापा आकर बोले रिक्शा मिल गई चलो। हम भारी भरकम बैग उठाकर बढ़े। मैंने देखा कि पापा कोई आम रिक्शा नहीं बल्कि ई - रिक्शा लेकर आए थे। मैं बहुत खुश हो गया। आसपास देखा तो बसों में भर - भरकर जाते लोग। जीप का भी वही हाल था। एक बात बता दूँ कि आप जब बेगूसराय स्टेशन के बाहर निकल कर देखेंगे तो आपको एक सड़क दिखेगी जो बहुत ज्यादा व्यस्त रहती है। आपको सड़क पार करने में पाँच से दस मिनट लग सकते हैं। हम ई - रिक्शा में बैठकर आगे बढ़े। हमे विशनपुर जाना था।

हम चार लोग थे। ई - रिक्शेवाले ने हमसे साठ रुपए लिए। रिक्शे के अंदर से मैं शहर का जायजा लेने लगा। पिछले कुछ सालों में शहर काफी उन्नती कर चुका था। जगह - जगह स्कूल नज़र आ रहे थे। बच्चों के लिए कोचिंग के पोस्टर दिखाई दे रहे थे। खास बात यह थी कि ज्यादातर पोस्टर गणित के लिए थे। मैंने सुना था कि बिहार के लोगों की गणित बहुत अच्छी होती है। इन पोस्टर को देखकर लग भी रहा था।रिक्शा हमारी चलते हुए एक चौराहे के पास पहुँची।

वहाँ मैंने देखा कि एक पुलिस कड़ी दोपहर में चौराहे की भीड़ सम्भाल रहा है कि तभी एक स्कूल बस गुज़रती है। उसमें बैठे सभी बच्चे खिड़की से हाथ हिलाकर उस पुलिस को टाटा करते हैं। बदले में वो पुलिस भी हाथ हिलाकर आगे बढ़कर खुशी खुशी उनका अभिवादन करता है। इस घटना से उसके चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान छा गई। मैंने भी इस घटने को एक कविता का रूप देना चाहा। वापस लौटकर मैंने इस घटना को भीष्म की कहानी नामक कविता में तबदील कर दिया।

मैंने सोचा शायद बुआ के घर में सभी शादी की तैय्यारी में व्यस्त होंगे इसीलिए स्टेशन पर हमें कोई लेने नहीं आया। यही सोच रहा था कि बुआ का घर आ गया। श्याम जी, जिनका विवाह होने वाला था, वह आए, सारा सामान उठाकर ले गए अंदर। अंदर जाते हुए बड़ा अजीब सा लग रहा था। प्यास भी बहुत लगी थी। धूप भी बहुत थी इतना लंबा सफर खत्म तो हुआ। यही सोचकर मैं अंदर गया। और मैंने देखा कि…
इतनी भी क्या जल्दी है,, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है...

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