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कहानी अभी खत्म नहीं हुई है - अध्याय 4



अध्याय 4
 मैं जब अंदर गया तब बातों बातों में पता चला कि इंदु दीदी के पति यानि मेरे जीजाजी छत पर हैं। नहाने के बाद मुझे अपने बाल बनाने थे। आईना और कंघी हमारे बैग में था। पूछने पर पता चला कि बैग भी ऊपर के कमरे में है। इस कारण मैं ऊपर चला गया। वहाँ तीन कमरे थे। ढूँढते ढूँढते मैं तीसरे कमरे में गया तो देखा कोई सो रहा था। मैंने सोचा हो ना हो यही जीजाजी हैं। मैं उन्हें उठाना नहीं चाहता था। चुपचाप मैं अंदर गया। अपनी बैग की चेन खोली कि तभी मुझे लगा कि चेन की आवाज से वे उठ गए होंगे। अब मैं बाल सवार रहा था कि दीदी आ गई। उन्होंने मेरा परिचय करवाया।
मैं उस वक़्त नहीं जानता था कि जीजाजी इस कहानी के अहम किरदार बनने वाले हैं। उन्होंने मुझे पास बिठाया। फिर हम बात करने लगे। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि जीजाजी भारतीय थल सेना में हैं। ऊँचे लंबे कद के, हट्टे - कट्टे ताक़तवर इंसान। सांवला रंग और बुलंद आवाज है इनकी। वो मुझसे पूछने लगे, आप उड़ीसा से आए हैं? उड़ीसा में कहाँ से? वगैरह वगैरह। उनका चरित्र बड़ा मोहक है। उनसे बात करके मुझे बहुत अच्छा लगा। वो मुझसे उड़ीसा के बारे में पूछते रहे, मैं बताता रहा। अच्छा एक बात और उड़ीसा बहुत दिन पहले से ही ओडिशा हो गया है। पर पता नहीं सभी लोग अब तक इसे उड़ीसा क्यूँ कहते हैं? बात करते हुए मैंने उन्हें पुरी, हीराकुद डैम, समलेश्वरी मंदिर, उसके पास बहती महानदी, संबलपुरी साड़ी, इत्यादि के बारे में बताता रहा। अंत में वे भी उड़ीसा देखने को उत्सुक हो उठे और कहा कि किसी दिन जरूर आएँगे घूमने उड़ीसा। इतना हुआ ही था कि मुझे नीचे से खाना खाने का आदेश आया। मैं फिर तुरंत ही नीचे चाला गया।
बिहारी लोगों की एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगती है वह यह है कि सुख हो या दुख, ये लोग हर परिस्थिति में एक दूसरे से मज़ाक़ कर के खुश रहना जानते हैं। शायद यही गुण इन्हें औरों से भिन्न बनाती है। यहाँ जीजा - साली - साला में, और तो और सरोज के साथ भी मजाक करते हैं। जो नहीं जानते उन्हें बता दूँ साला की पत्नी को सरोज भी कहा जाता है। देवर और भाभी में, दोस्त दोस्त में मजाक होता रहता है।
हम सब खाना खा लिए और मैं कुछ क्षण बैठा हुआ आराम कर रहा था। तब मेरी माँ हम सब के कपड़े धो कर आई और कहा कि सफर में कपड़े मैले हो गए थे। सभी के खाना खाने के बाद मेरी माँ ने खाना खाया। तब मेरी फुफा ने पूछा कहाँ रह गईं थी आप। मेरी माँ ने कहा कपड़े धो रही थी। फुफाजी ने चुटकी लेकर कहा - "हमरो चार गो कपड़ा छे, धोइएले" मतलब कि हमारे भी चार कपड़े धोने के लिए बाकी हैं। इस मज़ाक को सुनकर नीचे सभी हसने लगे। मेरी माँ ने भी हस्ते हुए कहा - हाँ दे दीजिए, मैं वो भी धो दूँगी। बिहारी लोग जिस प्रकार मज़ाक करते हैं, वो मुझे बहुत पसंद है।
मैं आराम करने के लिए ऊपर गया और अपनी अनुभूति को कविता का रूप देने की कोशिश करने लगा। लेटे लेटे जब कुछ भी नहीं बना तब मैं खिड़की से झांकने लगा मैंने देखा कि उस घर के बायीं ओर एक छोटा सा घर था, उस घर के बाद एक छत का मकान था। उस घर के खिड़की से कुछ कंप्युटर दिख रहे थे। बाद में मुझे मालूम हुआ कि वह मिट्टी परीक्षण केंद्र था। मैं फिर लेट गया और एक पत्रिका पढ़ने लगा जिसमें मेरी एक कविता छपी थी। मैं वो पढ़ ही रहा था कि कोई चुपचाप मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया।
कुछ क्षण बाद मैं पीछे पलट कर देखा तो वहाँ आलोक खड़ा था। जैसा कि मैंने आपको बताया था, आलोक इंदु दीदी का बेटा है। जब हमारी आँखें चार हुईं तो वह हँसा और कहने लगा कि आप इतना ध्यान लगा के पढ़ोगे तो कोई कुछ भी चुरा कर ले जाएगा। मुझे उस वक़्त मालूम नहीं था कि इस कहानी में आलोक कीइतना अहम भूमिका होने वाली है। मैं उससे बात करने लगा। फिर मैंने उसे उस पत्रिका में छपी मेरी वो कविता दिखाई। उसने पूछा आपने यह खुद लिखा है? तो मैंने कहा "हाँ" । फिर उसने कहा "ठीक है"। कोई और कविता सुनाईये। फिर मैंने अपनी एक कविता - "मेहनत की कीमत" सुनाई। वह सुनकर वह बोला - "बहुत अच्छी है"। "मैं तो कभी ऐसा नहीं लिख पाऊँगा।
फिर मैंने उससे पूछा कि आप लोग कहाँ रहते हो? तो उसने बोला हम सिक्किम में रहते हैं। सिक्किम मनिपाल यूनिवर्सिटी से थोड़ा दूर। उसने बताया कि उसके पिता भारत - चीन बॉर्डर पर तैनात हैं। फिर मैंने पूछा आप कौन सी कक्षा में पढ़ते हो? उसने कहा कि दाखिला में देरी होने के कारण वो पाँचवीं कक्षा में पढ़ता है। तब मैंने पूछा आप कौन - कौन सा विषय पढ़ते हो? तब उसने अन्य विषयों के साथ नेपाली का भी नाम लिया। मैंने पूछा आप नेपाली क्यूँ पढ़ते हो? तो उसने कहा कि वहाँ ज्यादातर लोग नेपाली हैं। फिर उसने नेपाली के दो चार शब्द सुनाए।
फिर मैंने उसे अपनी पत्रिका में लिखी एक अनुच्छेद पढ़ने को दिया। वह बोला यह कौन सी भाषा है । मैंने कहा ओडिया। वह चकित होकर कौतुहल की दृष्टि से देखने लगा। वह बोला मुझे आप पढ़कर दिखाइए। मैंने उसके सामने पढ़ा। मेरी जुबानी सुनकर वह हसने लगा। तभी वहाँ कृष्णा जी आए। आलोक ने वही अनुच्छेद उन्हें पढ़ने को दिया। वह बोले - इ का लिखा है। आलोक हसने लगा। फिर उस पत्रिका में छपी मेरी पूरी कक्षा की तस्वीर मैंने उन्हें दिखाया। कहा कि इनमें से मुझे खोज कर दिखाएं। आलोक तो नहीं पर कृष्णा जी ने 30 सेकंड में ढूँढ लिया। और तो और मेरे भाई को भी ढूँढ लिया। फिर वह चले गए अब तक मैं और आलोक अच्छे दोस्त बन गए थे। तब उसने कहा - "आपकी कोई जी. एफ. है?" मैंने बोला - "क्या?" आलोक ने कहा "गर्लफ्रेंड"!! कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

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